बहाउल्लाह के ज्येष्ठ पुत्र, अब्दुल-बहा हमें बताते हैं कि बहाई होने का आश्य क्या है:
''तुम इस प्रकार व्यवहार करो कि दूसरी आत्माओं के मध्य तुम सूर्य की भाति दैदीप्यमान और विशिष्ट बनो। अगर तुम में से कोई एक नगर में प्रवेश करे, तो उसे अपने निष्कपट हृदय से विश्वसनीयता एवं प्रेम, ईमानदारी एवं निष्ठा, सत्यवादिता तथा संसार के सभी लोगों के प्रति प्रेममय दया द्वारा आकर्षण का एक केंद्र बनना चाहिए, ताकि उस नगर के लोग पुकार कर कहें: ''यह आदमी निःसंदेह एक बहाई है, क्योंकि इसका शिष्टाचार, इसका व्यवहार, इसका आचरण, इसके आचार, इसकी प्रकृति बहाइयों के मानदण्डों को प्रतिबिम्बित करते हैं।'' जब तक तुम ऐसे पद को प्राप्त न करा लो, तुम्हें ईश्वर के विधान तथा उसके आदेश के प्रति विश्वस्त नहीं कहा जा सकता है।''
(अब्दुल-बहा की रचनाओं से संकलन से अंश)

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